Sunday, 27 November 2011

















ख्वाइश थी न की कभी मिले असमा से !!
कभी न रहे असमा में !!
पर वक्त जब बिता ,पीछे कुछ न कुछ छुटा !!

एक दिन साँस थमने लगी,दम घुटने लगा !!
और मैं तो आग ली लपटों में जलने लगा !!

दर्द का खुमार छाया और ,
जब आंखे खुली तो अपने को असमा में पाया !!

देखा जन्हा नहीं था आना !
ख्वाइश न थी कभी असमा में टिमटिमाना!!

जब आंखे खुली तो अपने को असमा में कैद पाया !
पर मेरे साथ था कोई रौशनी का साया !!


पर धरती पर न सही असमा में जगमगा रहा था !
लोगो की आँखों से प्यार पा रहा था !!

ख्वाइश न थी कभी असमा से मिलने की !

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